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1971 का युद्ध: जब पाकिस्तान के 3000 सैनिकों को 120 भारतीय सैनिकों ने चटाई थी धूल

TLB Desk

नई दिल्ली 11 Dec, 2020 03:26 pm

1971 के युद्ध का एक निर्णायक क्षण था भारतीय सेना का थार रेगिस्तान में लोंगेवाला पोस्ट का बचाव. पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे संघर्ष के दृष्टिकोण से पश्चिम भी महत्वपूर्ण था. भारत को ज्ञात था की दो छोर पर युद्ध करना एक आवश्यकता थी क्योंकि पश्चिम में पाकिस्तान की विजय का अर्थ था पाकिस्तान के हाथ सामरिक लाभ को सुपुर्द करना. सूत्रों से प्राप्त जानकारी से मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी को अवगत कराया गया कि उनकी पोस्ट की ओर 3000 सैनिकों का पाकिस्तानी सैन्यदल बढ़ रहा है, जिसमे भारी संख्या में टैंक भी शामिल हैं. इतने बड़े सैन्यदल से लोहा लेने के लिए उनके पास समय से अत्यावश्यक पुनर्बलन पहुँचने की सम्भावना क्षीण थी. यदि हमला रात में होता तो वायुसेना के उपलब्ध विमान भी उनकी सहायता करने में सक्षम नहीं थे. इस कारण से उन्हें विकल्प भी दिया गया कि वे सुरक्षित जगह के लिए कूच कर जाएँ.

परन्तु मेजर चांदपुरी ने निर्णय लिया कि वे अपने 120 सैनिकों के साथ लोंगेवाला पोस्ट की प्रतिरक्षा करेंगे. उन्होंने उपलब्ध सीमित समय में ही पोस्ट के चारों तरफ रक्षा पंक्तियाँ स्थापित करना शुरू कर दिया और अपेक्षित टैंकों के रास्ते में बारूद बिछा दिया. होने वाले भीषण हमले के लिए अपने सीमित संसाधन सुनियोजित ढंग से व्यवस्थित किए और रणनीति तैयार की.

दुश्मन ने रात के अँधेरे में लोंगेवाला पोस्ट पर अपने असंख्य टैंकों से हमला बोल दिया. यदि केवल संख्या की समीक्षा की जाये, तो यह मुकाबला एक तरफ़ा था. परन्तु युद्ध राजस्थान के रेगिस्तान में था और न की कागज़ पर. मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी की टुकड़ी की तैयारी पूरी थी और उनके 120 सैनिकों की वीरता एवं रणनीति असंख्य टैंकों पर भारी पड़ी. भारतीय सेना ने न केवल दुश्मन के हमले को रोका अपितु प्रत्युत्तर में पाकिस्तानी सेना को भारी क्षति पहुंचाने लगी. दुश्मन जिस अभियान को आसान समझ रहा था वही उसका काल बनने लगा था. मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी की टुकड़ी ने करीबन 6 घंटे तक उस हमले का प्रत्युत्तर दे कर लोंगेवाला का सफल बचाव किया. 

इसके उपरांत भारतीय वायु सेना को अवसर मिल गया कि दिन के उजाले में पाकिस्तानी टैंकों पर वज्रपात कर सकें और इस तरह दुश्मन के विनाश की रही सही कसार भी नहीं बची. इस पूरे अभियान में पाकिस्तानी सेना के 34 टैंक, 500 के करीब अतिरिक्त सेना वाहन और 200 से अधिक सैनिक काल के गाल में समा गए. भारतीय सेना के सिर्फ दो सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए जो किसी उपलब्धि से कम नहीं. लोंगेवाला की लड़ाई से विश्व भर में भारतीय सेना का डंका बज गया. दुश्मन हतोत्साहित और मनोबलविहीन हो चुका था. 1971 के युद्ध में विजय के लक्षण प्रत्यक्ष हो रहे थे.

(यह लेख जनरल वीके सिंह की फेसबुक वॉल से लिया गया है..)

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