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भारत ने विकसित की सुपर हाइपरसोनिक तकनीक, बना सकेगा आवाज़ से 6 गुना तेज़ उड़ने वाली मिसाइल

Atit

नई दिल्‍ली 07 Sep, 2020 04:37 pm

डिफेंस सेक्टर में भारत ने बहुत बड़ी छलांग लगाई है. रक्षा अनुसंधान विकास संगठन DRDO ने एक ऐसी तकनीक का सफल परीक्षण किया है, जिससे भारत अब आवाज़ से छह गुना अधिक रफ़्तार से उड़ने वाली मिसाइल बना सके.  DRDO के वैज्ञानिकों ने आज हाइपरसोनिक तकनीक डिमॉन्‍स्‍ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) टेस्‍ट को सफलतापूर्वक अंजाम दिया. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वैज्ञानिकों की इस ज़बरदस्त सफलता की जानकारी देश को दी.

DRDO ने ये टेस्ट ओडिशा के व्हीलर आइलैंड स्थित डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम लॉन्च कॉम्प्लेक्स से की. DRDO ने जिस लॉन्चर व्हीकल का टेस्ट किया है, वो हवा में आवाज़ से छह गुना ज़्यादा स्पीड से चल सकता है. DRDO के इस सफल टेस्ट के बाद भारत इस तकनीक से लैस दुनिया का चौथा देश बन गया है. इससे पहले केवल अमेरिका, रूस और चीन के पास ये तकनीक मौजूद है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बताया कि भारतीय वैज्ञानिकों ने ये व्हीकल पूरी तरह स्वदेश में बने स्क्रैमजेट प्रोपल्ज़न सिस्टम की मदद से तैयार किया है.

इस तकनीक के सफल परीक्षण के बाद अब भारत ऐसी हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलें बना सकेगा, जिसका पता दुश्मन के रडार भी नहीं लगा सकेंगे. रक्षा मंत्री ने कहा कि ये आत्मनिर्भर भारत मिशन की सफलता की एक बहुत लंबी छलांग है. और इसके लिए वैज्ञानिक बधाई के हक़दार हैं.

अगर आम आदमी की ज़ुबान में इस परीक्षण की अहमियत समझाएं, तो भारत अब बिना विदेशी मदद के हाइपरसोनिक मिसाइल बना सकेगा. DRDO अगले पांच साल में स्‍क्रैमजेट इंजन के साथ हाइपरसोनिक मिसाइल तैयार कर सकता है, जिसकी रफ्तार दो किलोमीटर प्रति सेकेंड से ज्‍यादा होगी. 

इसके अलावा, नई तकनीक के सफल परीक्षण के बाद, भारत बहुत कम लागत में अंतरिक्ष में सैटेलाइट भी लॉन्च कर सकेगा. 

HSTDV के सफल परीक्षण से भारत को अगली पीढ़ी की हाइपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस-2 तैयार करने में मदद मिलेगी. ब्रह्मोस मिसाइल रूस और भारत का ज्वाइंट प्रोजेक्ट है. फिलहाल DRDO और रूस की एजेंसी मिलकर ब्रह्मोस-2 को विकसित कर रहे हैं.

DRDO द्वारा तैयार स्‍क्रैमजेट प्रोपल्ज़न सिस्टम से दुनिया के किसी भी कोने में दुश्मन के ठिकाने को घंटे भर के भीतर निशाना बनाने वाली मिसाइल तैयार की जा सकेंगी. नॉर्मल मिसाइलें बैलिस्टिक ट्रैजेक्‍टरी फॉलो करती हैं. जिन्हें रडार आसानी से ट्रैक कर सकते हैं. वहीं, हाइपरसोनिक वेपन सिस्‍टम किसी तय रास्‍ते पर नहीं चलता. जिससे दुश्मन को अगर मिसाइल लॉन्च होने का पता चल भी जाए, तो उसके रास्ते का अंदाज़ा नहीं लगेगा. और हाइपरसोनिक मिसाइलों की रफ़्तार इतनी तेज़ होती है कि अमेरिका और रूस के मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम की मिसाइलें, हाइपरसोनिक मिसाइल को निशाना बना कर उसे ध्वस्त नहीं कर सकतीं.

अभी अमेरिका, रूस और चीन के पास ही ऐसी मिसाइलें हैं. रूस और चीन, ऐसी मिसाइलों के ज़रिए एटमी हमले करने के लिए भी तैयारी कर रहे हैं. वहीं, अमेरिका हाइपरसोनिक मिसाइलों को ट्रैक करने की तकनीक विकसित करने में जुटा हुआ है.

भारत के स्पेस मिशन के लिहाज़ से देखें, तो ये कामयाबी और भी बड़ी है. भारत अब हाइपरसोनिक तकनीक की मदद से अपने सैटेलाइट सस्ते में लॉन्च कर सकेगा. अभी, इसके लिए देश को विदेशी एजेंसियों को काफ़ी पैसा देना पड़ता है. इस तकनीक के सफल परीक्षण के बाद भारत अब दूसरे देशों के सैटेलाइट भी सस्ते में लॉन्च करके, स्पेस मार्केट को कैप्चर कर सकेगा.

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