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साल 2020 में पूर्व राष्ट्रपति से लेकर राजनीतिक जगत की इन हस्तियों ने ली विदा..

TLB Desk

नई दिल्ली 16 Dec, 2020 09:56 pm

कोरोना वायरस ने देश के लोगों के जीवन में ही बदलाव नहीं लाया बल्कि देश के कई महान विभूतियों को हमसे छीन लिया. राजनीतिक पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले देश के कई महान नेता काल के गाल में समा गए. ये वो नेता थे जिन्‍होंने भारत के निर्माण में अपनी अमिट छाप छोड़ी थी. पहले बात पूर्व राष्‍ट्रपति और कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता डॉक्‍टर प्रणब मुखर्जी की.  

भारत के पूर्व राष्‍ट्रपति डॉ. प्रणब मुखर्जी का 2 सितम्‍बर को 84 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. प्रणब मुखर्जी काफी समय से दिल्‍ली के सैन्‍य अस्‍पताल में भर्ती थें. प्रणब मुखर्जी कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे, और हाल ही में उनकी ब्रेन सर्जरी भी हुई थी. डॉक्‍टर प्रणब मुखर्जी सभी राजनीतिक दलों में सामान्‍य रूप से स्‍वीकार्य थें. विपक्षी पार्टियां भी उनकी प्रशंसक रही. कई ऐसे मौके आए जब कांग्रेस को संभालने की जरुरत हुई, प्रणब मुखर्जी आगे आए और कांग्रेस पार्टी को संभाला. चाहे अन्‍ना आंदोलन के समय सरकार को संभालने की बात हो या दिल्‍ली में उस दौरान चल रहे अन्‍य आंदोलन को लेकर सरकार का पक्ष लोगों के सामने रखना हो, वे हरदम आगे रहें. उनका जाना राजनीति जगत में एक खाली जगह पैदा कर गई जिसे शायद ही भरा जा सके. 

भारतीय राजनीति का एक सितारा बिखर गया. उनका नाथ था डॉक्‍टर रघुवंश प्रसाद सिंह. देश को रोजगार गारंटी योजना देने वाले शिल्‍पकार, राष्‍ट्रीय जनता दल के नेता और कई बार केंद्रीय मंत्री रहे डॉक्‍टर रघुवंश प्रसाद सिंह का निधन 13 सितम्‍बर को हो गया. 1946 में जन्‍मे रघुवंश प्रसाद सिंह का जाना सियासत की स्याह राह में जगमगाते एक दीपक के बूझ जाने की तरह है. आनेवाली पीढ़ी शायद यकीन नहीं करगी कि जिस पार्टी पर भ्रष्टाचार के कई दाग लगे थे उस पार्टी में रघुवंश प्रसाद सिंह जैसा ईमानदार नेता भी हुआ करते थे. बिहार की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बाद भी पूरा जीवन उनका बेदाग निकल गया, न कोई आक्षेप, न आरोप. उन्होंने जैसे राजनीति की शुरुआत की वैसे ही इस दुनिया को छोड़कर चले गए. विश्व को गणतंत्र का पाठ पढ़ाने वाली धरती वैशाली से डॉक्‍टर रघुवंश प्रसाद सिंह लगातार पांच बार सांसद निर्वाचित हुए. वे 1996 में जनता दल तथा 1998, 1999, 2004 एवं 2009 में राजद के टिकट पर चुनाव जीते. रघुवंश प्रसाद सिंह आरजेडी के उन चुनिंदा नेताओं में से रहे हैं जिन्होंने पार्टी को बुलंदियों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई.

दलित राजनीति के प्रमुख नेताओं में से एक रामविलास पासवान का निधन 8 अक्‍टूबर को हो गया. लोक जनशक्ति पार्टी के संस्‍थापक तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार में केन्द्रीय मंत्री रहे रामविलास पासवान 1969 में पहली बार विधायक बने थे. उन्होंने बिहार पुलिस की नौकरी छोड़कर राजनीति के मैदान में भाग्य अजमाया था. जिसके बाद उन्होंने कभी भी राजनीति में पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने अपने 5 दशक के राजनीतिक जीवन में कई सरकारों को बनते और गिरते अपनी आंखों से देखा. विश्‍वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री रहने के दौरान रामविलास पासवान उनके सबसे करीबी माने जाते थे. मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करवाने के फैसले के पीछे भी रामविलास पासवान का अहम रोल माना जाता रहा है. 1996 के बाद जब बिहार में जनता दल में कई बड़े विभाजन हुए उसके बाद की राजनीति में रामविलास ने अपने आप को हमेशा राज्य की राजनीति में किंग मेकर की भूमिका में रखा. गठबंधन करने और उससे अलग होने में रामविलास ने कभी भी परहेज नहीं किया. हमेशा उनके रिश्ते सभी दलों के नेताओं के साथ काफी अच्छे रहे. रामविलास पासवान ने 8 बार हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. इस दौरान उन्होंने अबतक छह प्रधानमंत्रियों के साथ मिलकर काम किया. 1989 में जीत के बाद वह वीपी सिंह की कैबिनेट में पहली बार श्रम मंत्री बने थे. एचडी देवगौड़ा और आईके गुजराल की सरकारों में रामविलास रेलमंत्री रहे. वर्तमान नरेंद्र मोदी की सरकार में वो खाद्य, जनवितरण और उपभोक्ता मामलों के मंत्री थें.  

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अब जिक्र एक और सियासी शख्‍स का जिसे राजनीतिक गलियारों में, कांग्रेस के अंदर, गांधी परिवार के बाद सबसे ज्‍यादा ताकतवर माना जाता था. जी हां... अहमद पटेल. 25 नवंबर को कोरोना के कारण वो हमारे बीच नहीं रहे. बात 2017 की है जब उन्‍हें कांग्रेस की ओर से पाँचवीं बार राज्यसभा भेजे जाने की तैयारी चल रही थी लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं थे. कहा जाता है कि तत्कालीन पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी ने उन्हें इसके लिए मनाया था और कहा था कि अकेले वही हैं जो अमित शाह और पूरी बीजेपी की बराबरी करने में सक्षम हैं. अहमद पटेल कांग्रेस में हमेशा संगठन के आदमी माने गए. अहमद पटेल के दोस्त, विरोधी और सहकर्मी उन्हें अहमद भाई कह कर पुकारते रहे, लेकिन वे हमेशा सत्ता और प्रचार से ख़ुद को दूर रखना ही पसंद करते थे. महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी सरकार के निर्माण में अहम भूमिका निभाई और धुर विरोधी शिवसेना को भी साथ लाने में कामयाब रहे. इसके बाद जब सचिन पायलट ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के ख़िलाफ़ बग़ावत की तब भी अहमद पटेल सक्रिय हुए. बाहरी दुनिया के लिए अहमद पटेल हमेशा एक पहेली बने रहे. लेकिन जो लोग कांग्रेसी संस्कृति को समझते हैं उनकी नज़र में वो हमेशा एक पूंजी रहे. 

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'कलकत्ता बॉय जो दिल्ली के जंगल में खो गया....' अपने लिए कुछ ऐसा ही कहा करते थें अमर सिंह. एक अगस्‍त को सिंगापुर के एक अस्‍पताल में उनका निधन हो गया. राजनीतिक गलियारों का ऐसा नेटवर्कर जिसकी जगह 1991 की आर्थिक उदारवाद ने दिल्ली दरबार में सदा के लिए बना दी. अपने करियर के चरम पर उन्होंने मशहूर हस्तियों को जोड़ा, कारोबारियों को जोड़ा और ये उनके न केवल राजनीतिक कारनामे थे बल्कि वे राजनीति की दुनिया में लोगों के लिए बड़ी हस्ती बन गए थे. कुछ लोग उन्हें पसंद करते थे, कुछ की वे जरूरत थे. कई लोग उनसे नफरत करते थे और उन्हें 'दलाल' बोलते थे. हालांकि उन्होंने इसे कभी बुरा नहीं माना और एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में डंके की चोट पर कहा था कि 'हां वे मुलायम सिंह यादव के लिए एक दलाल हैं.' 1996 में मुलायम सिंह यादव ने उन्हें राज्यसभा की सीट दी और एक तरह से समाजवादी पार्टी को चलाने की पूरी कमान उनके जिम्मे सौंप दी थी. यूपीए-1 के पक्ष में समाजवादी पार्टी का समर्थन जुटाकर अमर सिंह ने मनमोहन सिंह की सरकार बचाई थी. हर क्षेत्र में अमर सिंह के दोस्त थे. वे मेगा स्टार अमिताभ बच्चन के साथ भी खड़े हुए जिनकी कभी मुश्किल परिस्थितियों में अमर सिंह ने मदद की थी. उनके बच्चन परिवार, अनिल धीरूभाई अंबानी, मुलायम सिंह यादव और राष्ट्रीय राजनीति के बीच बहुत अच्छे लिंक थे. उन्होंने समाजवाद या सोशलिज्म को ग्लैमर, पावर, बिजनेस एलिट और यहां तक कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से जोड़ा. क्लिंटन 2005 में लखनऊ में एक भोज में शामिल हुए थे. समाजवादी पार्टी के नेता मानते हैं कि मुलायम सिंह और उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में अमर सिंह ने यूपीए सरकार पर दबाव देकर राहत दिलाने में मदद की थी. 2016 में मुलायम सिंह ने कहा कि वे अमर सिंह को अपने छोटे भाई की तरह मानते हैं और वे अमर सिंह को दोबारा पार्टी में लेकर आए. मुलायम सिंह के परिवार में दरार पड़ गई. अखिलेश ने पार्टी का मोर्चा संभाला, अपने पिता और चाचा को किनारे कर दिया. लेकिन 2017 में वे चुनाव हार गए और योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. सिंगापुर से जारी अपने अंतिम वीडियो में अमर सिंह ने कहा था कि मैं अच्छा हूं या बुरा, लेकिन आपका हूं. मैंने अपने तरीके से अपनी पूरी जिंदगी जी ली है, मैं दोबारा लौटूंगा. हालांकि अमर सिंह नहीं लौट सके. अमर सिंह की तरह अब शायद ही कोई 'डील मेकर्स' दिखे.

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