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SC ने कहा, किसानों को प्रदर्शन का अधिकार, पूछा- क्‍या कानूनों पर रोक लग सकती है?

Babita Pant

नई द‍िल्‍ली 17 Dec, 2020 08:20 pm

संसद के मानसून सत्र में पारित तीन नए कृषि कानूनों (New Farm Laws) के खिलाफ दिल्‍ली के तमाम बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे किसानों को हटाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को सुनवाई की. इस दोरान शीर्ष अदालत ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल (Attorney General K K Venugopal) से पूछा कि क्या केंद्र सरकार हाल ही में लागू किए गए कृषि कानूनों पर तब तक रोक लगा सकती है, जब तक कि अदालत इस मामले की सुनवाई नहीं कर लेती? शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि जब तक गतिरोध खत्म करने के लिए कोई समाधान नहीं मिल जाता, तब तक पुलिस को प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाने वाला कोई कदम नहीं उठाना चाहिए.

चीफ जस्टिस एसए बोबडे (CJI SA Bobde) की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि वह स्वीकार करते हैं कि किसानों को विरोध करने का अधिकार है और अदालत उनके विरोध के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करेगी, लेकिन वह निश्चित रूप से विरोध के तौर-तरीकों पर जरूर ध्यान देगी.

बेंच ने कहा कि अगर किसान और सरकार एक-दूसरे से बात नहीं करते हैं तो कोई निष्कर्ष नहीं निकल सकता. बेंच ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से कहा, "हम दोनों पक्षों को सुनने के लिए एक स्वतंत्र समिति बनाने के बारे में सोच रहे हैं. केंद्र को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुलिस किसी भी तरह की हिंसा में शामिल न हो."

याचिका में यह भी कहा गया था कि प्रदर्शनकारियों ने सड़कों और बॉर्डर के प्रवेश द्वार को ब्‍लॉक किया हुआ है, जिससे ट्रैफिक प्रभावित हुआ है. इस वजह से कोविड-19 के मरीजों समेत अन्‍य लोगों को मेडिकल सुविधाओं तक पहुंचने में दिक्‍कत आ रही है. इस पर बेंच ने कहा कि किसान हिंसा को नहीं भड़का सकते और इस तरह किसी शहर को ब्‍लॉक नहीं कर सकते. कोर्ट ने कहा कि वो सरकार से पूछेगी कि क्‍या प्रदर्शन के तरीके में कुछ बदलाव हो सकता है ताकि आम नागरिकों को इधर से उधर जाने में दिक्‍कत न हो.

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, "अदालत विरोध करने के अधिकार पर अंकुश नहीं लगा सकती. कानून के खिलाफ विरोध करने का किसानों का अधिकार है, लेकिन यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि इस अधिकार से अन्य नागरिकों के मौलिक अधिकार का हनन न हो."

सरकार की ओर से पक्ष रख रहे अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा, "वहां मौजूद कोई किसान मास्‍क नहीं पहनता है. वे बड़ी संख्‍या में एक साथ बैठते हैं. कोविड-19 एक बड़ी चिंता है और वे यहां से अपने गांव जाएंगे और बीमारी फैलाएंगे. किसान दूसरों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकते."

वहीं, पंजाब सरकार की ओर से वरिष्‍ठ वकील और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने कहा कि किसान शहर को ब्‍लॉक नहीं कर रहे हैं, बल्‍कि वे तो कानून के दायरे में रहकर दिल्‍ली आकर प्रदर्शन करना चाहते हैं.

इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि कोर्ट यह पूर्वानुमान नहीं लगा सकता कि कौन सी भीड़ हिंसक हो जाए और यह पुलिस काम है. कोर्ट के मुताबिक, "हम किसी की जिंदगी या प्रॉपर्टी को खतरे में नहीं डाल सकते. इस पर चिदंबरम ने आपत्ति जताई और कहा कि यह भीड़ नहीं, बल्‍कि किसानों का समूह है. इस पर CJI ने कहा, "हम उन्‍हें भीड़ नहीं कह रहे हैं."

बेंच ने यह बात भी स्पष्ट की कि वह विरोध जता रहे किसान यूनियनों की बात सुने बिना कोई आदेश पारित नहीं करने जा रही है. इसके साथ ही बेंच ने एजी से पूछा कि क्या इस बीच कोई ऐसा आश्वासन है कि कोई अधिशासी कार्रवाई नहीं होगी?

एजी ने जवाब देते हुए कहा कि आप किस तरह की अधिशासी कार्रवाई की बात कर रहे हैं? उन्होंने कहा कि ऐसा होता है तो फिर किसान वार्ता के लिए नहीं आएंगे. इस पर CJI ने दोहराया कि वार्ता को प्रभावी बनाना है. शीर्ष अदालत के इस सुझाव पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आपत्ति जताई.

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि किसान अड़े हुए हैं और जब तक सभी तीन कानूनों को रद्द नहीं किया जाता है, तब तक वे कोई वार्ता करना नहीं करना चाहते. इस पर प्रधान CJI ने जवाब दिया कि वे कहेंगे कि आप अड़े हुए हैं और इसीलिए शीर्ष अदालत इस पर चर्चा चाहती है.

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बिना कोई आदेश पारित किए सुनवाई खत्म कर दी और पक्षकारों को वेकेशन बेंच के सामने जाने की आजादी दे दी.

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