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Shri Krishna Janmashtami 2025: कब है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2025? व्रत, मुहूर्त और विधान

PujaPandit Desk

India 07 Aug, 2025 08:02 pm

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, जिसे गोकुलाष्टमी, कृष्णाष्टमी और जन्मोत्सव भी कहा जाता है, हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह पावन पर्व शनिवार, 16 अगस्त 2025 को मनाया जाएगा।

  • अष्टमी तिथि प्रारंभ: 16 अगस्त, प्रातः 03:12 बजे
  • अष्टमी तिथि समाप्त: 17 अगस्त, प्रातः 01:54 बजे
  • मध्यरात्रि पूजन मुहूर्त: 16 अगस्त रात्रि 11:59 बजे से 12:45 बजे तक
  • निशिता काल (कृष्ण जन्म समय): रात्रि 12:00 के आसपास

अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र के संयोग में जन्माष्टमी का पर्व विशेष पुण्यकारी माना जाता है।

जन्माष्टमी की पूजा विधि भक्त की श्रद्धा और संयम का प्रतीक होती है। परंपरा के अनुसार, भक्त व्रत रखकर दिनभर उपवास करते हैं और रात्रि 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं।

पूजा-विधि चरणबद्ध रूप में:

  1. स्नान और संकल्प:
    प्रातः स्नान करके “व्रत संकल्प” लें कि आप दिनभर उपवास करेंगे और रात्रि में पूजन करेंगे।
  2. मूर्ति स्थापना:
    किसी स्वच्छ स्थान पर लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं और उस पर श्रीकृष्ण की बाल स्वरूप मूर्ति स्थापित करें।
  3. अभिषेक और श्रृंगार:
    दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। फिर माखन, मिश्री, तुलसी, मोरपंख और मुरली से उनका श्रृंगार करें।
  4. मंत्रोच्चार और आरती:
    धूप-दीप प्रज्वलित करें और मंत्रों से भगवान को प्रसन्न करें। आरती करें और भजन-कीर्तन करें।
  5. झूला झुलाना:
    झूले में श्रीकृष्ण को विराजमान कर प्रेमपूर्वक झूला झुलाएं।
  6. प्रसाद वितरण और व्रत पारण:
    अगले दिन प्रातः पारण करें। माखन-मिश्री, पंचामृत, फल आदि प्रसाद स्वरूप वितरित करें।

श्रीकृष्ण बीज मंत्र

जन्माष्टमी के दिन भक्त निम्न बीज मंत्र का जाप अवश्य करें:

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

इस मंत्र का जाप मानसिक शांति, भक्ति और कृष्ण तत्व से जुड़ने का सीधा माध्यम है।

कथा: अंधकार में हुआ धर्म का जन्म

श्रीमद्भागवत और हरिवंश पुराण के अनुसार, जब पृथ्वी अधर्म, अत्याचार और असुर शक्तियों से त्रस्त थी, तब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण रूप में अवतार लेने का निश्चय किया।

कंस, जो मथुरा का अत्याचारी राजा था, ने भविष्यवाणी सुन रखी थी कि उसकी बहन देवकी का आठवां पुत्र उसका विनाश करेगा। उसने देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया और उनके छह पुत्रों की हत्या कर दी।

रात्रि के मध्य अंधकार में, देवकी ने कृष्ण को जन्म दिया। उसी समय योगमाया के प्रभाव से वासुदेव ने नवजात कृष्ण को टोकरी में रखा और यमुना पार कर गोकुल में नंद बाबा के घर पहुँचा दिए। वहाँ यशोदा ने कृष्ण को पाला और आगे चलकर उन्होंने कंस का अंत किया।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

  • धार्मिक रूप से, यह दिन अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है।
  • आध्यात्मिक रूप से, यह “निष्काम कर्म” और “भक्ति योग” का स्मरण है।
  • सामाजिक रूप से, यह दिन दही-हांडी, भजन संध्या, और बाल-रूप सज्जा प्रतियोगिताओं के माध्यम से जीवन में उमंग और सौहार्द का संचार करता है।

दही-हांडी उत्सव

महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में जन्माष्टमी के अगले दिन दही-हांडी का आयोजन होता है। इसमें युवा टोली ‘गोविंदा’ ऊंचाई पर टंगी मटकी फोड़ते हैं, जैसे कृष्ण ने माखन चुराया करते थे। यह उत्सव सामूहिक सहभागिता, साहस और उल्लास का प्रतीक है।

जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, यह जीवन की उन चुनौतियों से जूझने की प्रेरणा है, जो श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने जीवन में झेली और जीती। यह दिन हमें धर्म, विवेक, नीति और प्रेम के सूत्रों को अपनाने की प्रेरणा देता है।

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