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सी.पी. राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति उम्मीदवार क्यों? यह है BJP की रणनीति

Babita Pant

नई दिल्‍ली 18 Aug, 2025 04:07 pm

हाल ही में अचानक खाली हुए उपराष्ट्रपति पद के लिए बीजेपी ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सी.पी. राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर एक बड़ा राजनीतिक संकेत भेजा है। उनके चयन में दक्षिणी राज्यों, खासकर तमिलनाडु में बीजेपी की पैठ बढ़ाने का लक्ष्य है, साथ ही गैर-विवादात्मक छवि और ओबीसी प्रतिनिधित्व से राजनैतिक संतुलन बनाए रखना भी इसका हिस्सा है। चुनाव कार्यक्रम आयोग द्वारा पहले ही घोषित किया जा चुका है, जिसमें सभी महत्वपूर्ण तिथियाँ शामिल हैं।

बीजेपी की रणनीति का केंद्र

बीजेपी ने राधाकृष्णन को इसलिए चुना क्योंकि वे एक गैर-विवादास्पद नेता हैं, जिनका लंबे समय से जनाधार रहा है। तमिलनाडु के गोंडर समुदाय से होने के साथ ही वे ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो बीजेपी के सामाजिक-राजनीतिक समीकरण में मायने रखता है। मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की दक्षिण में पकड़ को मजबूत करने की रणनीति में यह कदम निर्णायक माना जा रहा है।

उनकी प्रभावशाली पृष्‍ठभूमि, आरएसएस से जुड़ाव, और राज्यों में प्रशासकीय अनुभव— जैसे महाराष्ट्र, झारखंड, तेलंगाना में राज्यपाल और पुडुचेरी के उपराज्यपाल की जिम्मेवारी— बीजेपी की दृष्टि में उनको यह पदभार संभालने योग्य बनाता है।

चुनाव कार्यक्रम: नामांकन से मतदान तक

  • नोटिफिकेशन जारी: 7 अगस्त
  • नामांकन की अंतिम तिथि: 21 अगस्त
  • नामों की जांच (scrutiny): 22 अगस्त
  • नाम वापसी की अंतिम तिथि: 25 अगस्त
  • चुनाव (अगर आवश्यक): 9 सितंबर, सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक
  • मतगणना: उसी दिन संभवत: शाम तक
    नये उप राष्‍ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होगा।

मुकाबला और NDA विरोध को चुनौती

राधाकृष्णन की नामांकन घोषणा ने विपक्षी सत्ता, खासकर DMK और अन्य INDIA ब्लॉक पार्टियों में हलचल मचा दी है। विपक्ष अपने पत्ते अभी से खोलने की रणनीति पर काम कर रहा है, क्योंकि उपराष्ट्रपति चयन में पारंपरिक रूप से क्षेत्रीय, जातिगत और गठबंधन समीकरण अहम भूमिका निभाते हैं।

वर्तमान में यह साफ नहीं कि क्या NDA को आवश्यक संख्या मिल पाएगी या विरोध दल आरक्षण बना लेंगे। यह चुनाव संख्या सिद्ध करना और विपक्ष का समन्वय दोनों पर आधारित होगा।

सी.पी. राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति उम्मीदवार होना बीजेपी के विस्तारवादी और सुदीर्घकालिक राजनीतिक दृष्टिकोण का हिस्सा है। दक्षिण के ओबीसी जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए उनके चयन ने राजनीतिक संतुलन साधने की बीजूपी की रणनीति को ज़ोरदार संकेत दिया है। अब सभी की निगाहें 9 सितंबर के चुनाव पर टिकी हुई हैं—जहां चुनाव आयोग की प्रक्रिया और राजनीतिक गठजोड़ निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

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