दिल्ली में आज सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील याचिका की सुनवाई की, जिसमें जम्मू और कश्मीर को पुनः राज्य का दर्जा देने की मांग की गई है। यह सुनवाई आर्टिकल 370 के निरस्तीकरण की 6वीं वर्षगांठ के मौके पर विशेष महत्व रखती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि संघशासित प्रदेश का दर्जा जम्मू-कश्मीर की लोकतांत्रिक संरचना और संघवाद को कमजोर कर रहा है। कोर्ट का यह फैसला आने वाले राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित कर सकता है।
शीर्ष न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल संकरनारायणन ने यह याचिका पेश की, जिसमें मुख्यमंत्री विधानसभा और राज्य सरकार पुनर्स्थापित करने की मांग की गई। संविधान में संघवाद के खिलाफ इस अस्वीकार्य स्थिति को दर्शाते हुए न्यायालय से शीघ्र फैसला माँगा गया।
राजनीतिक और न्यायिक परिदृश्य
यह मामला 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने की पृष्ठभूमि को फिर से सामने लाता है। यदि कोर्ट राज्य का दर्जा लौटाने का निर्देश देता है, तो केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों का पुनर्वितरण और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मज़बूती मिल सकती है। हाल के विधानसभा और लोकसभा चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण संकेत भी भेजते हैं।
राजनीतिक अपेक्षाएँ
इस सुनवाई ने राजनीतिक दलों के बीच क्षेत्रीय असंतोष और सत्ता-संघर्ष को नए सिरे से हवा दे दी है। विपक्षी दल इसे लोकतंत्र की जीत कहते हुए समर्थन जता रहे हैं, जबकि केंद्र इसके संवैधानिक और सुरक्षा आधारों पर निर्णय देने की बात कर रहा है। सामान्य मतदाताओं और युवा वर्ग में उम्मीद और आशंका दोनों व्याप्त हैं।
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