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प्रधानमंत्री मोदी 31 अगस्त को जाएंगे चीन, SCO शिखर सम्मेलन में लेंगे भाग

Babita Pant

India 07 Aug, 2025 04:41 pm

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 31 अगस्त को चीन की राजधानी बीजिंग की यात्रा पर जाएंगे, जहां वे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के वार्षिक शिखर सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब भारत और चीन के संबंधों में नई कूटनीतिक परतें जुड़ रही हैं और एशियाई देशों के बीच भू-राजनीतिक संतुलन तेजी से बदल रहा है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान वे न केवल SCO मंच पर भारत की भूमिका को स्पष्ट करेंगे, बल्कि कई द्विपक्षीय चर्चाओं का भी हिस्सा बन सकते हैं। संभावना है कि मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से सीमावर्ती मुद्दों, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर सीधी बातचीत करेंगे।

क्या है SCO?

शंघाई सहयोग संगठन (Shanghai Cooperation Organisation) एक बहुपक्षीय क्षेत्रीय संगठन है जिसकी स्थापना 2001 में हुई थी। भारत वर्ष 2017 में इसका पूर्ण सदस्य बना था। इस संगठन के प्रमुख सदस्य हैं– भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और ईरान। SCO का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद-विरोधी सहयोग, आर्थिक साझेदारी और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूती देना है।

भारत-चीन संबंधों की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि वर्ष 2020 में लद्दाख के गलवान घाटी में हुए भारत-चीन सैन्य टकराव के बाद दोनों देशों के रिश्तों में गहरी खटास आ गई थी। हालांकि, इसके बाद कई दौर की सैन्य और राजनयिक वार्ताओं के माध्यम से हालात कुछ हद तक सामान्य हुए हैं। ऐसे में मोदी की यह यात्रा दोनों देशों के बीच संवाद और संतुलन के नए रास्ते खोल सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग में होने वाला यह सम्मेलन भारत के लिए रणनीतिक बहुपक्षीय संवाद का एक अवसर है, जहां वह चीन और रूस जैसे देशों के साथ अपने संबंधों को कूटनीतिक संतुलन के साथ प्रगाढ़ बना सकता है।

मोदी की प्राथमिकताएं

प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा में जो मुद्दे प्राथमिकता में हो सकते हैं, उनमें प्रमुख हैं:

  • आतंकवाद के विरुद्ध साझा रणनीति
  • अफगानिस्तान की सुरक्षा स्थिति
  • ऊर्जा सुरक्षा और डिजिटल सहयोग
  • सदस्य देशों के बीच व्यापारिक सुविधा
  • सीमा पार कनेक्टिविटी परियोजनाओं में भारत की भूमिका

सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री की इस यात्रा के दौरान किसी प्रकार के द्विपक्षीय समझौते या घोषणाओं की भी संभावना है।

चीन और रूस की भूमिका

चीन, SCO का संस्थापक और सबसे प्रभावशाली सदस्य है। यह मंच उसके लिए एशिया में अमेरिकी प्रभाव को संतुलित करने का साधन है। दूसरी ओर, रूस भी संगठन में अपनी भूमिका को मजबूत करने में लगा है। इसी माह के अंत में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भी भारत दौरे पर आने की संभावना जताई जा रही है।

जानकार मानते हैं कि भारत, चीन और रूस के शीर्ष नेतृत्व की यह गतिविधियाँ क्षेत्रीय समीकरणों में नए सिरे से संतुलन बना सकती हैं।

भारत के लिए अवसर

विदेश नीति विश्लेषकों का कहना है कि SCO के मंच पर भारत अपनी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था” की नीति को मजबूती से रख सकता है।
जहां एक ओर भारत QUAD और I2U2 जैसे पश्चिमी गठबंधनों में सक्रिय है, वहीं SCO जैसे मंच पर उसकी भागीदारी यह दर्शाती है कि भारत संतुलन बनाकर वैश्विक साझेदारी को विस्तार दे रहा है।

SCO के जरिये भारत मध्य एशिया से व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में भी कदम बढ़ा सकता है।

चुनौतियाँ भी मौजूद

हालांकि, SCO में पाकिस्तान और चीन की मौजूदगी भारत के लिए कई बार कूटनीतिक असहजता का कारण बनती रही है। पाकिस्तान द्वारा बार-बार सीमा विवाद और कश्मीर के मुद्दे को उठाने की प्रवृत्ति से भारत असहमति जताता रहा है।

इसके अलावा चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) परियोजना में भारत की भागीदारी न होना भी एक अलगाव का बिंदु बना हुआ है।

प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा बहुपक्षीय संवादों और कूटनीतिक संतुलन की दिशा में भारत की विदेश नीति की एक सशक्त झलक पेश करती है। जहां पश्चिम के साथ संबंधों को संतुलित रखा जा रहा है, वहीं SCO जैसे मंचों पर भागीदारी यह संदेश देती है कि भारत वैश्विक कूटनीति में सक्रिय, आत्मनिर्भर और प्रभावशाली साझेदार बनकर उभर रहा है।

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